तेज़ एक्सप्रेस न्यूज – विष्णु गुप्ता
कांग्रेस पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बिहार चुनाव में हार के लिये जिम्मेदार मानती है! क्या राहुल गांधी भूल गए हैं कि कांग्रेस शासन के दौरान चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती थी?
कांग्रेस शासनकाल में राष्ट्रपति केवल प्रधानमंत्री की सिफारिश पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते थे, जबकि वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और समावेशी है, जिसमें विपक्ष के नेता सहित कई हितधारक शामिल हैं।
आपको दो खबरें बताते है कैसे कांग्रेस ने चुनाव आयोग को गुलाम बना लोकतंत्र की हत्या की थी।
भारत का एक चुनाव आयुक्त था “नवीन चावला”
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे नवीन चावला को, सरकार ने नहीं बल्कि सोनिया गांधी ने नियुक्त किया था।
सोनिया गांधी के लिए नवीन चावला उनकी पहली पसंद इसलिए थे क्योंकि नवीन चावला मदर टेरेसा के संपर्क में आकर क्रिप्टो क्रिश्चियन बन चुके थे।
उन्होंने मदर टेरेसा पर काफी किताबें लिखी…
इतना ही नहीं पद पर रहते हुए भी वह एक अपनी निजी एनजीओ चलाते थे।
और जब वह मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने 8 एकड़ जमीन जयपुर में उन्हें मुफ्त में दी थी।
नवीन चावला को इटली की सर्वोच्च कैथोलिक क्रिश्चियन संस्था ने अपना सर्वोच्च पुरस्कार दिया था।
31 जनवरी 2009 को तब के मुख्य चुनाव आयुक्त गोपाल स्वामी ने खुद राष्ट्रपति के पास जाकर शिकायत की थी कि उनके जूनियर चुनाव आयुक्त नवीन चावला कांग्रेस के एजेंट हैं और वह मीटिंगों की जानकारी कांग्रेस को लीक करते है। बीच मीटिंग में वह बाहर आकर बार-बार कांग्रेस नेताओं को मीटिंग की जानकारी देते रहते हैं और उनके निर्देश पर मीटिंग में उनका पक्ष रखते हैं।
लेकिन इसके बावजूद भी ना तो नवीन चावला को हटाया गया बल्कि गोपाल स्वामी के बाद अगला मुख्य चुनाव आयुक्त भी उसे ही बना दिया गया, जबकि उसका नंबर तीसरा था बीच में एक चुनाव आयुक्त और था जो दूसरे नंबर पर था और उसे बनाया जाना था।।
और नवीन चावला ने इस नमक का हक अदा किया। उसने 2009 के चुनाव में खुलकर बेईमानी करवाई।
ऐसे कई केसेस हुए थे । नवीन चावला के ही जमाने में कांग्रेस पार्टी ने सपा से ज्यादा लोकसभा सांसद हासिल किए थे उत्तर प्रदेश में।
यहां तक की सपा के गढ़ फिरोजाबाद चुनाव में राज बब्बर ने डिंपल को हरा दिया था जबकि राज बब्बर खुद चुनाव लड़ने को इच्छुक नहीं थे।
चिदंबरम को शिवगंगा से जयललिता की उम्मीदवार ने हरा दिया था, मगर तभी टीवी पर खबर आने लगी कि सोनिया गांधी चिदंबरम को ही गृहमंत्री बनाएंगी और उसके बाद दोबारा मतगणना हुई और उसमें चिदंबरम को जीता दिखा दिया गया।
पूरे 5 साल तक वह केस अदालत में चला और बाद में वह केस आया -गया हो गया और जयललिता इन 5 सालों में कहती रही कि हमारे साथ बेईमानी हुई है, चिदंबरम बेईमानी से जीते हैं।
मेनका गांधी को भी पहले हरा दिया गया था लेकिन मेनका गांधी दोबारा काउंटिंग पर अड़ गई और काफी बवाल के बाद जब दोबारा से वोटो की गिनती हुई तो उसमें मेनका गांधी जीत गई।
यह नवीन चावला ही था जिसने उस दौरान परिसीमन किया था और परिसीमन का उद्देश्य यह था कि संघर्ष वाली सीटों पर भाजपा के वोट कम कर दिए जाएं और कांग्रेस के वोटरों को उस सीट में शामिल कर लिया जाए खासकर मुसलमानों को।
सोचिए कांग्रेस ने इस देश में कितने कुकर्म किए हैं और हमारी याददाश्त इतनी छोटी होती है कि हम उसे भूल जाते हैं !
यही सोनिया गांधी है जिसने खूब हो हल्ला मचाया कि कि मोदी चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में राहुल गांधी को ओर चीफ जस्टिस को शामिल करे इस दबाव में सदन को कानून बनाना पड़ा।
अब यदि चुनाव आयुक्त को नियुक्ति में कोर्ट चला जाए तो जज साहब ही उस केस को सुनेगे जिस केस में कोर्ट खुद एक पार्टी हो…..
इसे कहते हैं संविधान की ओर लोकतंत्र की हत्या..
चुनाव आयुक्त से याद आया…!
एक सरदार डॉक्टर एस गिल भी चुनाव आयुक्त थे 1996 से 2001 के बीच में। इस समय अटल जी की सरकार जीतते जीतते हार गई थी
क्या तब उसने वोटरों में हेरा फेरी कराई थी कि जीते जीते अटल जी हार गए इस जीत के बदले पहले उसे राज्यसभा मेंबर केंद्रीय खेल मंत्री बनाया गया था।
पद के दुरुपयोग और पद छोड़ने के बाद पदाधिकारियों को उनकी सेवाओं के लिए पुरस्कार के रूप में राजनीतिक नियुक्तियां देने का कांग्रेस का रिकॉर्ड है। जैसे- पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त केवीके सुंदरम को सेवानिवृत्ति के बाद विधि आयोग का अध्यक्ष बनाया और पद्म विभूषण से सम्मानित किया। नागेंद्र सिंह को बाद में पद्म विभूषण मिला।
आरके त्रिवेदी को राज्यपाल बनाया व पद्मभूषण पुरस्कार से नवाजा गया। वीएस रामादेवी राज्यपाल बनाए गए। टीएन सेशन सेवानिवृत्त होकर कांग्रेस से चुनाव लड़े। ऐसे और भी उदाहरण हैं।
कांग्रेस कैसे चुनाव आयुक्तों को मोहरा बनती आई है और यही कारण है कि राहुल गांधी को आज भी लगता है कि वह जो करके आए हैं वह आज भी होता होगा।
ओर आज यही कांग्रेस चाहती है कि चुनाव आयुक्त उसकी पसंद का बने ….समझ गए न क्यों..??
अपनी हार छिपाने के लिये राहुल गांधी की कोशिश होती है की चुनाव आयोग की विश्वनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाकर लोकतंत्र पर बार-बार हमला किया जाए, उसे कमज़ोर किया जाए, लोगों को गुमराह किया जाए और देश में अराजकता का माहौल बनाया जाये।
मनीष प्रकाश






