ओबरा का गांधी मैदान धरोहर से नशे का अड्डा रखरखाव के लाखों खर्चे पर सवाल, युवा पीढ़ी खतरे में

तेज एक्सप्रेस न्यूज – किरण साहनी

ओबरा (सोनभद्र), 13 दिसंबर: कभी ओबरा नगर की शान, तापी विद्युत परियोजना के संरक्षण में गांधी मैदान प्रांगण अब कचरे का ढेर, शराब की बोतलों और नशे के पैकेटों से पट गया है। राष्ट्रीय पर्वों पर चमक-दमक तो ठीक, बाकी 11 महीने उपेक्षा की भेंट चढ़ा यह मैदान अब नाबालिगों के लिए नशे का केंद्र बन चुका है। सोन चेतना सामाजिक संगठन ने चेतावनी दी है—यह सिर्फ मैदान की कहानी नहीं, समाज के भविष्य का संकट है!मैदान की शानदार विरासत, अब बदहाली की तस्वीरगांधी मैदान ओबरा का वह ऐतिहासिक प्रांगण है, जहां दशकों से गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय उत्सव धूमधाम से मनाए जाते रहे। तापी विद्युत परियोजना की स्थापना के दौर में इसे सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाया गया था। शाम ढलते ही यहां बच्चों-युवाओं की भारी भीड़ उमड़ आती, खेलकूद की हंसी-ठिठोली गूंजती और समुदाय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता।लेकिन आज का नजारा दिल दहला देने वाला है। मैदान पर फैला कचरा, टूटे-फूटे ढांचे, घनी झाड़ियां, खाली शराब की बोतलें और नशे के पैकेट—सब कुछ उपेक्षा की गवाही दे रहे हैं। स्थानीय निवासी बताते हैं कि केवल राष्ट्रीय पर्वों से ठीक पहले साफ-सफाई होती है, बाकी समय इसे भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। सोन चेतना संगठन के संयोजक राजेश सिंह ने कहा, “यह मैदान प्रशासन की लापरवाही का जीता-जागता प्रमाण है। रखरखाव के लिए हर साल लाखों रुपये स्वीकृत होते हैं, लेकिन जमीन पर एक पैसे का असर नहीं दिखता।”खेल से नशे की ओर: नाबालिगों पर संकटबदलते दौर में स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ी है, लेकिन खेल मैदानों से उनका मोहभंग हो गया। गांधी मैदान अब खेल का मैदान कम, गलत गतिविधियों का अड्डा ज्यादा बन गया है। नाबालिग बच्चे यहां नशे के चंगुल में फंस रहे हैं—यह सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए घातक खतरा है।स्थानीय शिक्षक मीरा देवी ने ‘सोनभद्र टाइम्स’ को बताया, “पहले बच्चे यहां क्रिकेट, फुटबॉल खेलते थे। अब शाम को नशेड़ीओं की टोलियां घूमती हैं। अभिभावक चिंतित हैं कि उनका बच्चा खेलने जाएगा तो नशे की लत लग जाएगी।” आंकड़े और चौंकाने वाले हैं—पिछले एक साल में ओबरा थाने में नशे से जुड़े 25 से ज्यादा नाबालिग केस दर्ज हुए, जिनमें से अधिकांश इसी मैदान के आसपास के हैं। जिले के मनोवैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार का कहना है, “ऐसे मैदानों की कमी से युवाओं में अवसाद बढ़ रहा है, जो नशे की ओर धकेल रही है।”प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल: फंड का क्या हुआ?तापी विद्युत परियोजना के तहत यह मैदान संरक्षित है। सरकार हर साल रखरखाव के लिए धनराशि जारी करती है, लेकिन इसका पारदर्शी उपयोग कहां हो रहा? स्थानीय पार्षद रामप्रकाश ने स्वीकार किया, “फंड आता तो है, लेकिन ठेकेदारों की मिलीभगत से गबन हो जाता है। प्रशासन को जवाब देना होगा।”सोनभद्र जिला प्रशासन से संपर्क करने पर एसडीएम ओबरा ने कहा, “मामला संज्ञान में है। जल्द ही निरीक्षण करवाकर कार्रवाई करेंगे।” लेकिन स्थानीयों का विश्वास कम है—वर्षों से यही आश्वासन मिलते रहे हैं। RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, पिछले तीन साल में मैदान रखरखाव पर 15 लाख रुपये आवंटित हुए, लेकिन कोई ठोस रिपोर्ट नहीं।सामाजिक संगठनों की अपील: जागो ओबरा!सोन चेतना संगठन का कहना है कि यह मुद्दा सिर्फ सफाई तक सीमित नहीं—यह समाज की उदासीन मानसिकता का आईना है। संगठन ने नगरवासियों से अपील की है: आवाज उठाओ, मैदान को पुनर्जीवित करो। प्रस्ताव है फंड का पारदर्शी उपयोग, नशे पर सख्ती, बच्चों को खेल से जोड़ना।संगठन की प्रवक्ता ने कहा, “गांधी मैदान ओबरा की धरोहर है। यह शारीरिक मजबूती, खेल संस्कृति और सामूहिकता सिखा सकता है। अगर अभी नहीं जागे, तो भविष्य अंधकारमय होगा।” आने वाले रविवार को संगठन मैदान पर सफाई अभियान चला रहा है सभी नागरिकों से सहयोग की अपेक्षा।ओबरा का यह मैदान समाज के भविष्य की दिशा तय कर सकता है। प्रशासन, संगठन और समुदाय मिलकर इसे वापस पहचान दिलाएं, वरना नशे का जाल और फैलेगा। क्या ओबरा जागेगा?

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