विकास की आड़ में प्रकृति का विनाश, पहाड़ और पेड़ों को काटकर भरी जा रही राख

तेज़ एक्सप्रेस न्यूज – विजय सोनी

बीजपुर के महुआबारी और शांतिनगर का मामला,ग्रामीणों में भारी आक्रोश

बीजपुर/सोनभद्र। एनटीपीसी रिहंद के राख बांध से राख निस्तारण के नाम पर क्षेत्र के प्राकृतिक स्वरूप के साथ बड़ा खिलवाड़ शुरू हो गया है। बीजपुर पुनर्वास के समीप सिरसोती गाँव के महुआबारी में कार्यदायी संस्थाओं द्वारा न केवल नियमों को ताक पर रखा जा रहा है, बल्कि पहाड़ों को छलनी कर पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाई जा रही है। इस अंधाधुंध विनाश से महुआबारी और शांतिनगर बस्ती के ग्रामीणों में गहरा आक्रोश व्याप्त है।

पहाड़ों को काटकर बनाई जा रहीं खाइयां, वन विभाग मौन

क्षेत्र के महुआबारी इलाके में बड़े-बड़े पहाड़ों को काटकर पहले वहां से धड़ल्ले से मिट्टी निकाली जा रही है, जिससे क्षेत्र में गहरे गड्ढे और डरावनी खाइयां बन गई हैं। अब इन्हीं कृत्रिम गड्ढों को एनटीपीसी की राख से भरा जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि राख निस्तारण की आड़ में पहाड़ों का अस्तित्व ही मिटाया जा रहा है।चौंकाने वाली बात यह है कि पहाड़ों की कटिंग के दौरान वहां स्थित दर्जनों पुराने और हरे-भरे पेड़ों को जेसीबी मशीनों से जमींदोज किया जा रहा है। इस विनाश पर वन विभाग पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। जब इस संबंध में वन विभाग के अधिकारियों से बात की जाती है, तो वे इसे एनटीपीसी की निजी जमीन बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। अब स्थानीय जनता के बीच यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि जमीन किसी की भी हो, क्या उस पर लगे हरे पेड़ों की बलि देने और प्राकृतिक पहाड़ों को काटने की कानूनी अनुमति दी जा सकती है।

बीमारियों का खतरा हवा में घुल रहा जहर, भूगर्भ जल पर संकट

राख के इस अंधाधुंध भराव और पहाड़ों के कटान से पूरे क्षेत्र में धूल और राख के बारीक कण हवा में घुल रहे हैं, जिससे महुआबारी और शांतिनगर बस्ती प्रदूषण की चपेट में आ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि हवा में उड़ती राख के कारण स्थानीय लोगों में सांस और दमा जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बेहद बढ़ गया है। बिना किसी वैज्ञानिक मानक और सुरक्षा उपायों के सीधे जमीन में राख भरने से क्षेत्र का भूगर्भ जल प्रदूषित होने की पूरी आशंका है, जिससे भविष्य में पीने के पानी का संकट खड़ा हो जाएगा।

उग्र आंदोलन की चेतावनी

प्रकृति के इस दोहन से नाराज स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर प्रकृति का ऐसा विनाश किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। राख निस्तारण के लिए पहाड़ों को काटना और पेड़ों को गिराना आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। यदि इस अवैध कटान और राख फिलिंग को तुरंत बंद नहीं किया गया, तो वे एक बड़े और उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

बड़ा सवाल

इस पूरे मामले में जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रहस्यमयी चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है। क्या अधिकारी किसी बड़े हादसे या जन-आंदोलन का इंतजार कर रहे हैं?

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