तेज एक्सप्रेस न्यूज – किरण साहनी
ओबरा/सोनभद्र | 27 फरवरी 2026
ओबरा तहसील के ग्राम बिल्ली–मारकुंडी में प्रस्तावित डोलो स्टोन खनन परियोजना को लेकर आयोजित लोक सुनवाई अब गंभीर विवादों में घिरती नजर आ रही है। पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए आयोजित यह जनसुनवाई उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय, सोनभद्र के तत्वावधान में संपन्न हुई, लेकिन इसकी अवधि और प्रक्रिया पर ग्रामीणों ने तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या है मामला?
जानकारी के अनुसार प्रस्ताव श्रीमती केशरी देवी पत्नी हरेराम प्रसाद, निवासी शिव नगर कॉलोनी, डिग्री कॉलेज रोड, ओबरा–सोनभद्र व अन्य के नाम से है। अराजी संख्या 4870 क, 4871 क एवं 4871 ख, कुल रकबा 1.2280 हेक्टेयर में डोलो स्टोन खनन की योजना प्रस्तावित है।
खनन परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर स्थानीय स्तर पर पहले से ही चर्चाएं थीं। ऐसे में जनसुनवाई को ग्रामीण अपनी बात रखने का बड़ा मंच मान रहे थे। “सिर्फ 10–15 मिनट में खत्म हुई प्रक्रिया”
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्धारित समय पर शुरू हुई लोक सुनवाई में संबंधित अधिकारी महज 10 से 15 मिनट रुकने के बाद ही चले गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां दर्जनों प्रभावित परिवार मौजूद थे, वहां इतनी कम अवधि में उनकी समस्याएं सुनी ही नहीं जा सकतीं।
ग्रामीणों का तर्क है कि जनसुनवाई कम से कम दो घंटे चलनी चाहिए थी, ताकि प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति अपनी आपत्ति और सुझाव विस्तार से रख सके।
पर्यावरण पर मंडराता खतरा पर्यावरण के लिए सक्रिय कार्यकर्ता निर्भय चौधरी ने खनन से होने वाले संभावित दुष्प्रभावों को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि खदानों में पानी भरने के बाद निकलने वाला प्रदूषित जल आसपास के खेतों को बंजर बना देता है।उन्होंने चेताया कि अधिक गहराई तक खनन होने से भूजल स्तर नीचे चला जाता है, जिससे बोरिंग का पानी गंदा और पीने योग्य नहीं रह जाता। लगातार चलने वाले टिप्पर वाहनों से उड़ने वाली धूल-मिट्टी घरों तक पहुंचती है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों में श्वसन संबंधी बीमारियां बढ़ने का खतरा रहता है। “नियमों की अनदेखी, पेड़ कटे – पौधे नहीं लगे”
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि खनन पट्टा स्वीकृत होने के बाद कई स्थानों पर अंधाधुंध खनन किया जाता है। पुराने पेड़ काट दिए जाते हैं, लेकिन नियमानुसार नए पौधे नहीं लगाए जाते।
ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर कंपनियों द्वारा जमीनी स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं दिखाई देती। पारदर्शिता पर उठे सवाल कुछ ग्रामीणों ने दावा किया कि सुनवाई के दौरान अधिकतर मौजूद लोग परियोजना से जुड़े कर्मचारी थे, जबकि वास्तविक स्थानीय निवासियों की संख्या बेहद कम थी।
मौके पर लगे पोस्टर में स्पष्ट उल्लेख था कि सुनवाई के दौरान स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों एवं संबंधित पक्षों को सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया जाएगा। प्रशासन द्वारा अधिक से अधिक सहभागिता सुनिश्चित करने की अपील भी की गई थी।लेकिन हालात इसके विपरीत नजर आए, जिससे जनसुनवाई की पारदर्शिता और उद्देश्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है। ग्रामीणों की मांग – दोबारा हो निष्पक्ष सुनवाई
क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि यदि सरकार पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य को लेकर गंभीर है, तो लोक सुनवाई की प्रक्रिया को पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाए। साथ ही, लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और दोबारा निष्पक्ष जनसुनवाई कराई जाए।
वहीं प्रशासन ने क्षेत्रवासियों से अधिक से अधिक सहभागिता सुनिश्चित करने की अपील दोहराई है।
अब देखना यह होगा कि विवादों में घिरी यह जनसुनवाई आगे क्या मोड़ लेती है और प्रस्तावित खनन परियोजना पर प्रशासन क्या निर्णय लेता है।






