तेज़ एक्सप्रेस न्यूज – किरण साहनी
सोनभद्र।कभी घर चलाने के लिए मजदूरी करने को मजबूर रहने वाली सोनभद्र की एक साधारण महिला आज दर्जनों परिवारों की रोजी-रोटी का सहारा बन चुकी है। करमा ब्लॉक के सरौली गांव की रहने वाली 27 वर्षीय हेमा कुमारी ने संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर वह मुकाम हासिल किया है, जिसकी मिसाल अब पूरे जिले में दी जा रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) और प्रदेश सरकार की महिला सशक्तिकरण योजनाओं की मदद से हेमा ने न केवल अपनी जिंदगी बदली, बल्कि गांव की महिलाओं और युवाओं के लिए भी नई उम्मीद की किरण बन गई हैं।
गरीबी और आर्थिक तंगी से जूझते परिवार में पली-बढ़ी हेमा के लिए जिंदगी आसान नहीं थी। घर की जिम्मेदारियों के बीच उन्हें मजदूरी तक करनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। परिवार को बेहतर जिंदगी देने का सपना लेकर उन्होंने “सत्य आजीविका महिला स्वयं सहायता समूह” से जुड़कर अपने नए सफर की शुरुआत की। यहीं से उनकी जिंदगी ने नई दिशा पकड़ ली।
हेमा को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत फर्नीचर निर्माण का प्रशिक्षण दिलाया गया। साथ ही 20 हजार रुपये का ऋण भी उपलब्ध कराया गया। इस छोटी सी मदद ने हेमा के सपनों को उड़ान दे दी। उन्होंने अपने पति धर्मेन्द्र प्रजापति के साथ मिलकर लकड़ी के फर्नीचर बनाना शुरू किया और स्थानीय बाजारों में बेचने लगीं। शुरुआत छोटी थी, लेकिन मेहनत बड़ी थी। धीरे-धीरे उनके बनाए फर्नीचर की गुणवत्ता और डिजाइन लोगों को पसंद आने लगे और बाजार में मांग बढ़ती चली गई।
जैसे-जैसे कारोबार बढ़ा, वैसे-वैसे हेमा का आत्मविश्वास भी मजबूत होता गया। एनआरएलएम की ओर से उन्हें समय-समय पर व्यवसाय प्रबंधन, विपणन और कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया गया। वित्तीय सहयोग भी लगातार मिलता रहा। यही वजह रही कि कुछ ही वर्षों में हेमा ने अपने छोटे काम को बड़े कारोबार में बदल दिया।
आज स्थिति यह है कि हेमा के यहां तैयार होने वाले फर्नीचर की बाजार में भारी मांग है। बढ़ते ऑर्डर को पूरा करने के लिए उन्होंने 20 कारीगरों को रोजगार दे रखा है। गांव की यह महिला उद्यमी अब सालाना करीब 20 लाख रुपये का कारोबार कर रही हैं। उन्होंने अपने व्यवसाय का विस्तार करते हुए खुद की दुकान भी खोल ली है, जहां अब फर्नीचर के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की बिक्री भी हो रही है।
हेमा बताती हैं कि कारोबार बढ़ने के बाद उन्हें एनआरएलएम के माध्यम से 5 लाख रुपये का ऋण मिला। समय पर ऋण चुकाने के बाद दोबारा 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई, जिससे उन्होंने अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ाया। आज उनकी दुकान क्षेत्र में लोगों के लिए भरोसेमंद केंद्र बन चुकी है।
हेमा का कहना है कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन वे अपने गांव में रोजगार देने वाली महिला बनेंगी। लेकिन सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता, समय पर मिली मदद और खुद की मेहनत ने उनकी जिंदगी बदल दी। अब वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं और पूरे परिवार का बेहतर ढंग से पालन-पोषण कर पा रही हैं।
ग्रामीण महिलाओं के लिए हेमा आज प्रेरणा बन चुकी हैं। गांव की कई महिलाएं अब स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी अधिकारी सरिता सिंह ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रशिक्षण, ऋण और विपणन सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। उनका कहना है कि यदि महिलाएं आगे बढ़ने का संकल्प लें तो सरकार और एनआरएलएम हर स्तर पर उनके साथ खड़ा है।





