तेज़ एक्सप्रेस न्यूज – किरण साहनी
कोन (सोनभद्र)। केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत गांव-गांव में करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए सामुदायिक शौचालयों का उद्देश्य ग्रामीणों को स्वच्छ, सुरक्षित और सम्मानजनक शौच सुविधा उपलब्ध कराना था। लेकिन विकासखंड कोन की ग्राम पंचायत पीपरखाड़ के टोला केवाल में बना सामुदायिक शौचालय सरकारी दावों की हकीकत उजागर करता दिखाई दे रहा है। वर्षों से उपेक्षा और बदहाल व्यवस्था के कारण यह शौचालय अब सुविधा केंद्र कम और गंदगी का अड्डा ज्यादा बन चुका है।
शौचालय के अंदर प्रवेश करते ही चारों तरफ फैली गंदगी, बदबू, टूटे हुए दरवाजे, जाम शौच सीटें, बंद पड़े नल और पानी की पूरी तरह अनुपलब्ध व्यवस्था लोगों को इसका उपयोग करने से रोक रही है। हालत इतनी खराब है कि ग्रामीण मजबूरी में आज भी खुले में शौच जाने को विवश हैं। इससे स्वच्छता अभियान के साथ-साथ ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
ग्रामीण ब्रह्म प्रकाश त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि पिछले लगभग पांच वर्षों से इस सामुदायिक शौचालय की नियमित सफाई नहीं कराई गई। कई बार शिकायत करने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला। हाल ही में सोशल मीडिया पर शौचालय की बदहाली का वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन हरकत में तो आया, लेकिन केवल बाहर की सफाई कर औपचारिकता निभा दी गई। अंदर की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीण बच्चा चंद्रवंशी, चंद्रशेखर तिवारी, जितेश तिवारी, जादूनी बैगा और राममिलन चेरो सहित अन्य लोगों ने बताया कि शौचालय के अंदर चारों ओर गंदगी फैली हुई है। नलों में पानी नहीं आता, सफाई का कोई इंतजाम नहीं है और दुर्गंध के कारण वहां कुछ देर खड़ा रहना भी मुश्किल हो जाता है। उनका कहना है कि जब उपयोग ही नहीं हो सकता तो करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए ऐसे शौचालयों का क्या औचित्य है।
सोमवार दोपहर बड़ी संख्या में ग्रामीण सामुदायिक शौचालय के बाहर एकत्र हुए और प्रशासन के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि शौचालय के संचालन और रखरखाव के लिए सहायक की नियुक्ति की गई है, जिसे हर महीने मानदेय दिया जाता है। इसके अलावा सफाई और रखरखाव के लिए अलग से बजट भी जारी होता है, लेकिन धरातल पर उसका कोई असर दिखाई नहीं देता। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सरकारी धन खर्च होने के बावजूद सुविधा बदहाल क्यों है और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या केवल पीपरखाड़ तक सीमित नहीं है। रामगढ़, बरवाखाड़, खेतकटवा समेत विकासखंड के कई गांवों में बने सामुदायिक शौचालय या तो वर्षों से बंद पड़े हैं, या जर्जर हो चुके हैं अथवा उपयोग के लायक ही नहीं बचे हैं। कहीं पानी नहीं है तो कहीं ताले लटके हैं, जबकि कई स्थानों पर नियमित सफाई न होने से शौचालय पूरी तरह गंदगी से भर चुके हैं।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि सभी सामुदायिक शौचालयों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, रखरखाव पर खर्च हुए बजट का सामाजिक ऑडिट कराया जाए और लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर तक निगरानी की व्यवस्था मौजूद है, नियमित निरीक्षण के निर्देश जारी होते हैं और रखरखाव के लिए हर वर्ष बजट भी स्वीकृत किया जाता है, तो आखिर इन सामुदायिक शौचालयों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन है? करोड़ों रुपये की सरकारी योजना की यह तस्वीर न केवल स्वच्छ भारत मिशन की जमीनी हकीकत उजागर करती है, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।






