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केतार से प्रदीप चन्द्रवंशी की रिपोर्ट
केतार: गढ़वा पलामू में कमजोर वारिस से किसान हो रहे हैं परेशान। किसानों की बढ़ रही मुसीबत। वहीं वर्षा ऋतु के एक माह समाप्त होने के उपरांत भी चापाकल व कुआं सुखा पड़ा है, बताते चलें कि झारखंड उत्तर प्रदेश के लाइफ लाइन कहे जाने वाली पंडा नदी जो {कोन} कचनरवा (उत्तर प्रदेश) से लगभग 15 किलो मीटर दक्षिण पहाड़ी के पांडू चट्टान से निकलते हुए उत्तर प्रदेश और झारखंड के लगभग 200 गांव सहरों को पार करते हुए केतार प्रखंड अंतर्गत लोहरगाड़ा पंचायत के मेरौनी गांव में आ कर सोन नदी में मिल चुकी है। जिसमे अभी तक ऐतिहासिक नदी पंडा नदी में पानी नहीं होने से और भी ज्यादा चिंता का विषय बन गया है। कभी नदी का नजारा ऐसा था की वर्षो तक पानी का बहाव रहता था, जिससे जल स्तर ऊपर होने से कुआं, चापाकल एवं बोरिंग में पर्याप्त मात्रा में पानी होने से किसानों को सिंचाई करने में असानी व सुविधा जनक एवं चारो तरफ हरियाली के साथ सुंदर दृश्य देखने को मिलता था। बड़े बुजुर्गों के अनुसार सदाबह नदी होने से भीषण गर्मी में भी पंडा नदी का पानी नहीं सूखता था बल्कि कहीं कहीं इतना भरपूर गहराई पानी होता था की लोगों को मापना भी मुश्किल हुआ करता था लोग मछलियां मार कर व्यवसाय करते तो वहीं किसान सिंचाई में उपयोग करते थे। चापाकल व कुआं से पीने योग्य भरपूर मात्रा में पानी मिलती थी। इस वर्ष अभी तक पंडा नदी में पानी नहीं होना किसानों की सिंचाई लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।






