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मणिपुर में ड्रग्स कोई साधारण अपराध नहीं हैं। यह राज्य अंतरराष्ट्रीय ड्रग रूट पर स्थित है, जहाँ नशीले पदार्थ केवल युवाओं को नहीं, बल्कि आतंकवाद, हथियारों और संगठित हिंसा को भी पोषित करते हैं। यहाँ ड्रग ट्रैफिकिंग कानून-व्यवस्था का नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।
इसी संदर्भ में थाउनाओजम ब्रिंडा, मणिपुर पुलिस की वरिष्ठ महिला अधिकारी, द्वारा एक बड़े ड्रग माफिया की गिरफ्तारी कोई वीरता नहीं थी। यह उनका कर्तव्य था। जान का जोखिम जानते हुए, राजनीतिक प्रभाव के बावजूद, उन्होंने वही किया जिसके लिए वर्दी दी जाती है—कानून लागू करना।
इसके बाद राज्य का असली चेहरा सामने आया।
गिरफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री बीरेंद्र सिंह का सीधा दबाव आया।
कोई संकेत नहीं—सीधा फोन, सीधा निर्देश: आरोपी को छोड़ा जाए।
जब ब्रिंडा ने इनकार किया, तो अपराधी नहीं, वह स्वयं सत्ता की समस्या बन गईं।
अंततः उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा।
यह इस्तीफा किसी प्रशासनिक मतभेद का नहीं, बल्कि उस विकल्प की गवाही है जो सत्ता ईमानदार अधिकारी के सामने रखती है—कानून तोड़ो या पद छोड़ो। उन्होंने पद छोड़ना चुना।
यह घटना अकेली नहीं है।
यह मानना कठिन है कि मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य में एक हाई-प्रोफाइल ड्रग गिरफ्तारी, मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप और एक वरिष्ठ IPS अधिकारी का इस्तीफा केंद्रीय गृह मंत्रालय की जानकारी के बिना हुआ होगा।
अगर जानकारी थी और चुप्पी रही, तो यह संरक्षण है।
अगर जानकारी नहीं थी, तो यह अक्षमता।
दोनों ही लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं।
यही पैटर्न गुजरात के मुद्रा पोर्ट पर दिखता है।
मुद्रा पोर्ट पर 23,000 करोड़ रुपये की ड्रग्स पकड़ी जाती हैं—इतनी बड़ी खेप कि वह किसी छोटे गिरोह से संभव नहीं। फिर भी जांच बच्चों जैसी रहती है।
न नेटवर्क उजागर होता है,
न जवाबदेही तय होती है।
मणिपुर और मुद्रा पोर्ट एक ही व्यवस्था के दो चेहरे हैं।
एक जगह ड्रग नेटवर्क को छूने की कोशिश होती है—तो थाउनाओजम ब्रिंडा जैसी अधिकारी को बाहर कर दिया जाता है।
दूसरी जगह नेटवर्क सामने होता है—तो जांच वहीं रुक जाती है जहाँ असहज सवाल शुरू होते हैं।
परिणाम स्पष्ट है।
ड्रग्स आतंकवाद को पोषण देते हैं।
सीमावर्ती इलाक़े अस्थिर होते हैं।
युवाओं का भविष्य नष्ट होता है।
और इसके बावजूद भारत में ड्रग ट्रैफिकिंग बढ़ती जा रही है।
समस्या कानून की नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत ईमानदारी के क्षरण की है।
एक धर्म-प्रधान देश में नैतिकता बहुत बोली जाती है, लेकिन जब नैतिकता सत्ता के लिए असुविधाजनक हो जाती है, तो उसे बाहर कर दिया जाता है।
इसीलिए भ्रष्ट सुरक्षित रहते हैं, और ईमानदार अकेले।
इस विरोधाभास को अगर एक पंक्ति में कहना हो, तो शायद यही सबसे सटीक है—
सौ में नब्बे बेईमान,
फिर भी मेरा देश महान।
यह व्यंग्य नहीं, चेतावनी है।
क्योंकि जिस देश में ड्रग माफिया सुरक्षित हों
और उन्हें रोकने वाली अधिकारी—थाउनाओजम ब्रिंडा—को इस्तीफा देना पड़े,
वहाँ सबसे बड़ा नशा ड्रग्स का नहीं,
सत्ता का होता है।
Sourse – Gyanendra Awasthi
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