सरकार को अब जरूरत है शिक्षकों के प्रति दमनकारी नीतियों को बदलने की…

तेज़ एक्सप्रेस न्यूज़ – प्रशांत श्रीवास्तव

ब्यूरो हेड

दुनिया की तमाम खुशियां तब तक बेकार हैं जब तक उन्हें परिवार के साथ साझा करने का अवसर न मिले। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक से बातचीत में कुछ ऐसी बातें सामने आईं जिसने शिक्षकों के जीवन के स्याह पहलू से मेरा परिचय करवाया। आम लोगों की एक धारणा है कि शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। स्कूल में रेगुलर नहीं हैं फलां- फलां… लेकिन शिक्षकों को किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है इसको जानने के बाद आपकी भी मानसिकता उनके प्रति बदल जाएगी।
सर्व विदित है कि यदि हमारा नेतृत्व मजबूत नहीं है तो मातहत स्वयं ही लापरवाह हो जाते हैं। पूर्व की सरकारों में जो हालात थे वो कुछ ऐसे ही थे। प्राथमिक विद्यालय की शिक्षा, शिक्षकों को लेकर सरकारें उदासीन थी और सरकार जब उदासीन हो जाती है तो उनके नीचे की व्यवस्थाएं खुद-ब-खुद आरामपसंद हो जाती हैं।

योगी सरकार में ऐसा नहीं है। सरकार बच्चों एवं शिक्षकों सभी को लेकर सख्त है। पढ़ाई से लेकर स्कूल व मिड डे मील तक सभी की व्यवस्थाएं पुष्ट हैं। अपवाद को छोड़ कर..
बावजूद इसके शिक्षा को नियमित करने एवं व्यवस्थाएं सुधारने के लिए योगी सरकार ने जो नियम बनाये वह आवश्यकता से अधिक सख्त हैं।
इतिहास गवाह है कि सरकार की दमनकारी नीतियों को जनता ने ठुकराया है। बात को शुरू से प्रारंभ करते हैं। आपको शायद ही पता हो कि एक टीचर केवल पढ़ाता ही नहीं है, उसके अलावा बहुत से ऐसे काम है जिसे मजबूरन करता है जो पूरी तरह अप्रासंगिक हैं। ऐसे तमाम कार्यों को फेहरिस्त है जो दर्शाती है कि इन कार्यों की वजह से बच्चों की पढ़ाई के साथ ही एक शिक्षक की निजी जिंदगी कितनी प्रभावित होती है।
एक मार्मिक व्यथा बताता हूँ आपको- एक सज्जन ने बातचीत में भावुक होकर बताया कि उनके साले साहब जो कि पेशे से एक उत्तर प्रदेश में प्रथमिक शिक्षक थे, साल 2009 में जब उनकी नौकरी लगी थी तो पोस्टिंग सीतापुर में थी जबकि उनकी धर्मपत्नी की पोस्टिंग सोनभद्र में थी जो की सीतापुर से 600 किलोमीटर दूर था। घर में बुज़ुर्ग माँ- बाप हैं। एक बच्चा है जो मां के साथ रहता है। एक अकेली माँ के लिए अपने बच्चे को पालना कितना मुश्किल है आप कल्पना कर सकते हैं। तमाम कोशिशों के बीच साल 2015 में वही जैसे- तैसे अपनी पोस्टिंग प्रयागराज (मूल निवास) करवाने में सफल हुए जो कि सोनभद्र से फिर भी 250 किलोमीटर दूर था। फिर भी अनेक कोशिशों के बाद भी अपनी पत्नी का ट्रांसफर प्रयागराज नही करवा सके।
अब जबकि वह सफल नहीं हुए तो अवसादग्रस्त होकर रुग्णता के शिकार हो गए और कोरोना की दूसरी लहर में उनकी जीवन लीला भी समाप्त हो गई। परिवार के साथ रहने का, अपने बच्चे को बड़ा होते देखने का ख्वाब बस ख्वाब ही रह गया। वह अपने पीछे एक छोटा सा बच्चा और बुजुर्ग माँ- बाप के अलावा एक लाचार बीवी को छोड़ कर चले गए। बावजूद इसके आज भी पत्नी अपने मूल निवास (प्रयागराज) स्थानांतरण नहीं करवा सकी है। जिससे कि वजह अपने बुजुर्ग सास- ससुर एवं अपने पति की यादों के साथ अपना जीवन बिता सकें। सोचिये कितना मार्मिक है ये..
ऐसी नौकरी ऐसे पैसे का क्या मोल जब उसे खर्च करने के लिए परिवार ही साथ न हो तो..
ऐसी कितनी ही शिक्षिकाएं एवं शिक्षक हैं जो अपने परिवार से कोसो दूर हैं सिर्फ स्थानांतरण की सख्त नियमों की वजह से। ये सरकारी दमनकारी नीति नहीं है तो फिर क्या है?
एक ओर सरकार निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। धड़ल्ले से सरकारी उपक्रम को निजी कंपनी के हवाले किया जा रहा है। सरकार तमाम निजी कंपनियों को प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से शामिल कर रही है। वहीं दूसरी ओर जहां पति के सरकारी सेवा में होने पर स्थानांतरण में 10 अंक जुड़ते हैं वहीं पति के प्राइवेट नौकरी में होने पर एक अंक भी नहीं दिए जाते। ऐसे में सरकारी सेवा में कार्यरत पति के विपरीत ऐसी महिला शिक्षिका आपना स्थानांतरण सिर्फ इसलिए नहीं करवा पाती, क्योंकि उनके पति प्राइवेट नौकरी में हैं। यह सरकार का दोहरा रवैय्या नहीं है तो क्या है?
मेरी व्यक्तिगत राय है कि एक कर्मचारी अपना काम ईमानदारी , आत्मीयता एवं पूरी लगन से तभी कर सकता है जब वो मानसिक रूप से तनावमुक्त एवं दबाव मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब यथासंभव शिक्षक अपने मूलनिवास में रह कर या फिर अपनी सहूलियत की जगह रह कर काम कर सके। क्योंकि दूर रह कर वह अपने घर की चिंताओं और वह जाकर परेशानियों को निपटाने के गांठ-जोड़ में ही लगा रहेगा तो क्या खाक नौकरी में लग कर काम कर पाएगा। लेकिन सरकार का ध्यान इस ओर बिकुल नहीं है। सरकार को लगता है कि टीचर्स को वेतन देकर हमने खरीद लिया है, उनसे हम पढ़ाई के अलावा दुनिया भर के काम करवा सकते हैं।

आज शिक्षक बंधुआ मजदूर बना दिया गया है। जिसे बच्चों को पढ़ाने के लिए पहले बच्चों को घर-घर जाकर बुलाना पड़ता है। एक लिपिक की तरह पूरे स्कूल का एडमिनिस्ट्रेशन मैनेज करना होता है। आधार पंजीकरण, माता पिता का पंजीकरण से लेकर विभिन्न दातावेज का लेखा- जोखा रखना पड़ता है।

साल की 14 कैजुअल लीव को छोड़ कर किसी प्रकार की कोई छुट्टियां नहीं है। ट्रांसफर के मामले में काला पानी की सजा दी जाती है। देश के सेना के जवान से भी तुलना की जाए तो भी स्थिति बेहद भयावह है। गलती से बीमार पड़ गए तो मेडिकल लीव लेने की प्रक्रिया इतनी लंबी है कि छुट्टी लेने का विचार ही बदल जाता है। योगी सरकार ने छुट्टियों में भी बेइंतहा कटौती कर दी है। शिक्षा विभाग में महिला शिक्षिकाओं का मानसिक शोषण भी किसी से छुपा नहीं है। कभी मिशन प्रेरणा तो कभी डीबीटी तो कभी सेल्फी लेकर सार्वजनिक ऍप में अपलोड करने का तानाशाही फरमान आ जाता है। ये निजता है हनन नहीं तो और क्या है?

इसके अलावा कभी जनगणना तो कभी चुनाव। सरकार की दमनकारी नीतियों के फलस्वरूप कोरोना काल में कितने ही अध्यापक काल के गाल में समा गए यह जगजाहिर है। शिक्षक संकुल की जिम्मेदारियों से लेकर शौचालय बनवाने तक हर जिम्मेदारी शिक्षक की है। बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता, स्कूल की व्यवस्थाएं, मिड डे मील, कॉस्ट कन्वर्जन, प्रधान का व्यापक हस्तक्षेप, बीएसए की धमकियां, बीइओ का कमीशन, बच्चों की स्कूल ड्रेस से लेकर उनके जूतों तक का कमिशन भी शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों तक पहुँचाने की खबरे अक्सर सामने आती हैं। दाल में नामक जितना फण्ड आता है उसी में टाइलीकारण, पुनुरुद्धार, रंग रोगन इत्यादि की जिम्मेदारी दिमाग खराब कर देती है।

अपने हिस्से ही छुट्टियों के लिए शिक्षा विभाग के बाबुओं की चिरौरी करनी पड़ती है। इतना ही नहीं चाइल्ड केअर लीव और प्रेगनेंसी लीव के लिए भी दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं और अपने हिस्से ही छुट्टियों के लिए बाबुओं की जेबें गरम करनी पड़ती हैं। दूर से देखने पर जितना लुभावना लगता है अंदर से उतना ही स्याह है ये पेशा।
माननीय मुख्यमंत्री योगी जी इस लेख का उद्देश्य आपका ध्यान इस ओर आकृष्ट कराने का है कि ज़मीनी स्तर पर क्या चुनौतियां है उसे एक शिक्षक के स्तर पर महसूस कीजिये। साथ ही अंत में यह कहूंगा कि अब आम लोगों को भी शिक्षकों के प्रति अपनी मानसिकता बदलने का समय आ गया है…

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