मकर संक्रांति पर सेवा की गूंज! निशा बबलू सिंह बनीं सैकड़ों जरूरतमंदों की उम्मीद

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तेज एक्सप्रेस न्यूज – किरण साहनी

(सोनभद्र)।रेणुकूट
मकर संक्रांति का पर्व जहां दान-पुण्य और उत्सव का प्रतीक माना जाता है, वहीं रेणुकूट क्षेत्र में इस बार यह दिन सेवा, संवेदना और संघर्ष की जीत के रूप में दर्ज हो गया। पूर्व नगर अध्यक्ष निशा बबलू सिंह के परिवार ने उनके कार्यालय पर भव्य भंडारे और कंबल वितरण का आयोजन कर यह साबित कर दिया कि सच्ची राजनीति और समाजसेवा शब्दों से नहीं, कर्मों से पहचानी जाती है।कड़ाके की ठंड में जब जरूरतमंद ठिठुर रहे थे, तब निशा सिंह और उनकी टीम मानवता की ढाल बनकर सामने आई। सैकड़ों गरीब, असहाय और मजदूरों को न केवल गर्म भोजन कराया गया, बल्कि ठंड से बचाव के लिए कंबल भी वितरित किए गए। कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ खुद इस बात की गवाह बनी कि सेवा का भरोसा आज भी जिंदा है।संघर्ष जिसने सेवा को जन्म दिया
निशा सिंह की जीवन कहानी किसी प्रेरणादायक संघर्ष से कम नहीं है। पति की निर्मम हत्या के बाद जहां एक आम महिला टूट जाती, वहीं निशा सिंह ने दर्द को ताकत बनाया और समाजसेवा को अपना मिशन बना लिया। आज वे सोनभद्र की उन गिनी-चुनी महिलाओं में शामिल हैं, जिन्होंने खुद की पहचान, खुद की टीम और खुद का सामाजिक दायित्व खड़ा किया है।जहां जनप्रतिनिधि खामोश, वहां निशा सिंह मुखर स्थानीय लोगों का कहना है कि मजदूरों के शोषण, गरीबों की पीड़ा और असहायों की मदद के लिए जो आवाज सांसद-विधायकों को उठानी चाहिए थी, वही आवाज आज निशा बबलू सिंह अकेले बुलंद कर रही हैं। औद्योगिक जनपद सोनभद्र में मजदूरों की हालत आज भी जस की तस है, लेकिन निशा सिंह उनके लिए संरक्षक, सहारा और संघर्ष की आवाज बन चुकी हैं।
सेवा की विरासत संभालते अभय प्रताप सिंह इस सामाजिक यात्रा में उनके बड़े पुत्र अभय प्रताप सिंह भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। युवाओं के बीच अभय आज एक ऐसी मिसाल बन चुके हैं, जो राजनीति से ऊपर उठकर संवेदना और संस्कारों की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।भोजन-कंबल नहीं, जिंदगी बचाने तक का संकल्प
निशा सिंह की टीम की पहचान केवल भंडारे और कंबल वितरण तक सीमित नहीं है। गंभीर रूप से बीमार गरीबों को लखनऊ, बनारस और दिल्ली जैसे बड़े अस्पतालों तक पहुंचाना, इलाज की व्यवस्था कराना और मरीज की देखभाल करना—यह सब उनकी टीम नियमित रूप से करती है, ताकि कोई भी गरीबी के कारण दम न तोड़े।
निशा सिंह का कहना है
मैं ईश्वर से सिर्फ इतनी शक्ति मांगती हूं कि जब तक सांस है, तब तक समाज के वंचित और पीड़ित लोगों की सेवा करती रहूं।”
मकर संक्रांति के इस आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया कि समाज बदलने के लिए पद नहीं, जज्बा चाहिएऔर जज्बा हो तो एक महिला भी सैकड़ों जिंदगियों की उम्मीद बन सकती है।

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