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अविमुक्तेश्वरानंद इन दिनों बड़े चर्चित हैं । उन्होंने एक बयान दिया ही था कि सोशल मीडिया पर उनकी कुंडली बाहर आ गई । उनके जीवन को इस कदर खंगाला जा रहा है कि वह भी पता चल गया जो शायद स्वयं उन्हें भी याद न रहा हो । खैर हमें तो उनके वर्तमान से मतलब है । कुंभ से मतलब है ।
उनके उस वक्तव्य से जरूर मतलब है जो उन्होंने योगी सरकार की बर्खास्तगी के लिए दिया है । अविमुक्तेश्वरानंद पिछले साल तब भी चर्चित हुए थे जब अयोध्या में राम मंदिर का उदघाटन होने वाला था । अलबत्ता यह कोई आश्चर्य की बात नहीं । वे सदा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं , कांग्रेस के नजदीकी रहे हैं । या फिर यूँ कहिए कि हर उस पार्टी के मित्र रहे हैं जो भाजपा की विरोधी रही है ।
दरअसल अविमुक्तेश्वरानंद जिन ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद गिरी के शिष्य हैं , उनका इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी से गहरा सम्बन्ध रहा है । सही बात तो यह है कि स्वरूपानंद खुद भी कट्टर कांग्रेसी विचारधारा के साथ जुड़े हुए थे । संत जगत में उनकी ख्याति एक परम विद्वान के रूप में तो थी ।
परंतु उनका सम्मान वे ही संत अधिक करते थे जिनकी अपनी विचारधारा भी आरएसएस और बीजेपी विरोधी थी । ज्योतिर्पीठ को लेकर उनके और संघ पोषित स्वामी वासुदेवानंद गिरी के बीच बहुत गहरा विवाद कोर्ट के भीतर और बाहर दोनों जगह चला । वासुदेवानंद के साथ साथ माधवाश्रम भी ज्योतिर्पीठ पर ही शंकाराचार्य होने का दावा करते रहे । इन दोनों को नागाओं के सबसे बड़े जूना तथा निरंजनी अखाड़े का समर्थन प्राप्त था ।
स्वरूपानंद दो पीठों ज्योतिर्पीठ और शारदापीठ के शंकराचार्य पद पर आसीन थे । अब यह मत पूछिए कि क्या एक व्यक्ति दो जगद्गुरु पीठों का शंकराचार्य हो सकता है ? आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित शंकर महामठामनाय के अनुसार तो बिल्कुल भी नहीं । लेकिन स्वरूपानंद आजीवन बने भी रहे , मान भी पाते रहे ।
उनके जाने के बाद उनके दोनों शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद और सदानंद क्रमशः ज्योर्तिमठ और शारदामठ के शंकराचार्य बन बैठे । इस पट्टाभिषेक में स्वरूपानंद की कथित वसीयत और काशी विद्वत परिषद दोनों का सहारा लिया गया । मामला कोर्ट में विचाराधीन है । उधर अखाड़ा परिषद इन दोनों को ही शंकराचार्य नहीं मानती । मानते श्रृंगेरी पीठ के भारती तीर्थ और गोवर्धन पीठ के निश्चलानंद भी नहीं । लेकिन कमाल देखिए । दोनों ने अविमुक्तेश्वरानंद के साथ प्रयागराज में कुंभ स्नान किया ?
योगी आदित्यनाथ की बर्खास्तगी की मांग करना बुरी बात नहीं । बशर्ते कि करने वाला ऐसा करने का अधिकारी हो । प्रयागराज में मौनी अमावस्या पर घटी दुर्घटना के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने नेता प्रतिपक्ष की भांति बयान देते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ का त्यागपत्र मांग लिया । जाहिर है कुंभ अभी चल रहा है और लोगों की भावनाएं कुंभ से जुड़ी हैं तो अविमुक्तेश्वरानंद बुरी तरह ट्रोल हो गए । अखाड़ा परिषद ही नहीं समूचे षडदर्शन साधु समाज ने उनका विरोध शुरू कर दिया ।
सभी संत बता रहे हैं कि उनका अविमुक्तेश्वरानंद के बयान या उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है । सभी उनके बयान को गलत ठहरा रहे हैं । पहले से ही विवादित चल रहे अविमुक्तेश्वरानंद अब बुरी तरह ट्रोल हो रहे हैं । एक भी संत उन्हें शंकराचार्य मानने को तैयार नहीं । दुर्घटना निःसंदेह दर्दनाक है जिसकी जांच शुरू हो चुकी है । प्रयागराज कुंभ में विश्वस्तरीय प्रबन्ध किए गए हैं । अलबत्ता ऐसी आकस्मिक दुर्घटना का दोषी सीधे योगी को ठहराकर अविमुक्तेश्वरानंद ने संत के बाने में छिपे बैठे किसी के “आदमी ” का परिचय जरूर करा दिया है ।
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