तेज़ एक्सप्रेस न्यूज – प्रदीप दुबे
गाजीपुर। जनपद के जंगीपुर थाना क्षेत्र में एक पत्रकार के साथ हुई कथित दबंगई और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। मामला 2 तारीख की सुबह लगभग 11:00 बजे का बताया जा रहा है, जब स्थानीय पत्रकार प्रदीप दुबे के घर पर कुछ दबंग व्यक्तियों ने धावा बोल दिया।
पीड़ित के अनुसार, आरोपियों ने उनके मकान की दीवार को खतरनाक तरीके से तोड़ दिया, इसके बाद घर के शटर का ताला तोड़कर जबरन अंदर प्रवेश किया और कब्जा करने की कोशिश की। इस घटना से क्षेत्र में हड़कंप मच गया और पीड़ित परिवार दहशत में आ गया।
थाने में दी गई तहरीर, फिर बदली कहानी
घटना के बाद पत्रकार प्रदीप दुबे न्याय की उम्मीद लेकर जंगीपुर थाने पहुंचे और लिखित तहरीर दी। आरोप है कि जब थाना अध्यक्ष शिवमणि त्रिपाठी ने तहरीर पढ़ी, तो पहले कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। लेकिन कुछ समय बाद उन्हें फोन कर दोबारा थाने बुलाया गया।
पीड़ित का आरोप है कि थाने में उन पर दबाव बनाकर मूल तहरीर को बदलवाया गया। दीवार तोड़कर कब्जा करने जैसे गंभीर आरोपों को मारपीट के मामूली मामले में परिवर्तित कर दिया गया। इससे पूरे मामले की दिशा ही बदल गई।

CCTV से खुल सकता है सच
प्रदीप दुबे का कहना है कि वह पहली बार लगभग 12:00 बजे थाने पहुंचे थे और तहरीर दी थी। इसके बाद दोबारा फोन कर उन्हें बुलाया गया।
उनका दावा है कि थाने में लगे CCTV कैमरों में यह पूरा घटनाक्रम कैद होगा, जिससे सच्चाई सामने आ सकती है कि आखिर क्यों और किन परिस्थितियों में तहरीर बदली गई।
जांच के नाम पर मामला लंबित
तहरीर बदलने के बाद पुलिस द्वारा मामले को जांच के नाम पर लटकाया जा रहा है।
अब तक न तो आरोपियों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई है और न ही पीड़ित को न्याय मिल पाया है।
उठते सवाल
दीवार तोड़ने और जबरन कब्जा करने जैसे गंभीर मामले को हल्का क्यों किया गया?
क्या थाने में पीड़ित पर दबाव बनाकर तहरीर बदलवाना उचित है?
क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर रही है या मामला दबाने की कोशिश हो रही है?
आखिर थाना अध्यक्ष शिवमणि त्रिपाठी की भूमिका क्या है?
सबूत मौजूद, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?
पीड़ित के अनुसार, उनके पास दोनों तहरीरों की फोटो कॉपी मौजूद है, जो यह साबित करती है कि शिकायत को बदला गया है। ऐसे में यह मामला और भी गंभीर हो जाता है और निष्पक्ष जांच की मांग को मजबूती देता है।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के साथ अन्याय का नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और पुलिस की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़ा करता है।